बातचीत / 'उरी' में फ्लाइट लेफ्टिनेंट सीरत कौर बनीं कीर्ति कुल्हारी बोलीं, गणतंत्र ने हमें असली आजादी दी तभी तो आज विरोध कर पाते हैं

बॉलीवुड डेस्क. कीर्ति कुल्हारी ने ‘पिंक’, ‘शैतान’, ‘इंदू सरकार’, ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ और ‘मिशन मंगल’ जैसी फिल्मों में सपोर्टिंग लेकिन दमदार रोल से अपनी अलग पहचान बनाई है। ‘उरी’ में फ्लाइट लेफ्टिनेंट सीरत कौर में कीर्ति की भूमिका यादगार रही। कीर्ति इन दिनों अपनी अपकमिंग फिल्मों  ‘गर्ल ऑन द ट्रेन, ‘बताशा’ के अलावा वेबसीरीज ‘फोर मोर शॉर्ट्स प्लीजसीजन 2 सहित कई अन्य प्रोजेक्ट्स में बिजी हैं। कीर्ति के पिता नौसेना में रहे हैं और उनकी बहन सेना में डॉक्टर हैं, इसीलिए देश से जुड़े मुद्दों पर वह खुलकर अपनी बात रखती हैं। 71वें गणतंत्र दिवस के मौके पर दैनिक भास्कर से खास बातचीत की।


डिफेंस बैकग्राउंड में बढ़ना बच्चों के लिए खास तौर पर फायदेमंद होता है, खासकर जब आप पेरेंट्स को आप ट्रेनिंग करते देखते हो तो खुद ब खुद वो डिसिप्लिन, समय की पाबंदी जैसी क्वालिटी आप में भी आ जाती हैं। इसके अलावा एक और खास बात कि बचपन से इतने अच्छे माहौल में पलने-बढ़ने पर आपके अंदर किसी धर्म को लेकर या किसी भी तरह के भेदभाव को लेकर कोई जगह नहीं रहती क्योंकि डिफेंस में हर धर्म के लोग भर्ती होते हैं। स्कूलों में भी हर धर्म-जाति के बच्चे एक साथ पढ़ते हैं, तो शुरुआत से ही आपके मन में भेदभाव जैसे विचार नहीं आते और सब एक परिवार की तरह लगते हैं।  ऐसे में जब बाहर आप लोगों को धर्म, जाति या किसी भेदभाव के चलते लड़ते-झगड़ते देखते हैं तो काफी बुरा लगता है और आप ये सोचते हैं कि ये दुनिया उस दुनिया से अलग क्यों है?’ ये बाते मुझे सिविल सोसाइटी में मिसिंग लगती हैं।


आज की पढ़ाई से सिर्फ किताबी ज्ञान मिलता है


‘ 26 जनवरी को छुट्‌टी मनाने की धारणा कोई आज से नहीं है, बचपन से ही हम यह देखते आ रहे हैं।  नेशनल फेस्टिवल के बारे में स्कूल में बहुत कुछ पढ़ाया जाता है। हां, फर्क इतना है कि चूकिं वह हमारी पढ़ाई का हिस्सा होता है तो  हम उस बात को जीवन में नहीं उतार पाते और इस दिन के महत्व को उतना समझ नहीं पाते। इसके लिए एजूकेशन सिस्टम में सुधार की जरूरत है जिसमें हम बच्चों को केवल किताबी ज्ञान न देकर उन्हें ऐसे शिक्षा भी दें जिससे उन्हें जीवन में भी आगे बढ़ने में मदद मिल सके। आप ही बताइए स्कूल में हमने जितना पढ़ा वो हमें कितना काम आया? इसलिए स्कूलों की यह जिम्मेदारी है कि वह पढ़ाई को इतना रोचक बनाएं कि बच्चे सिर्फ एग्जाम पास करने के प्रेशर में न पढ़ें और वो बातें भी जानें जो उनके देश और समाज से जुड़ी हैं।’


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